परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी

परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी

                  संक्षिप्त परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी ( ब्रजगजल प्रवर्तक, बहुभाषी शायर (कवि) एवं व्यंग्यकार)

ब्रजभाषा की महिमा

 अमरित की धारा बरसै और चैन हिये में आवै है

जैसें इ अपनी बानी बोलें म्हों मीठौ है जावै है

 

खारे कों मीठौ, मीठे कों और उ मधुर बनावै है

ब्रजभासा वौ भासा है जो रोम रोम हरसावै है

नयन क्यों आप के तर है रहे हैं

 नयन क्यों आप के तर है रहे हैं।

ये अँसुआ तौ हमारे भाग के हैं॥

 

बने हौ आप जब-जब भोर के पल।

हम'उ तब-तब सुमन जैसें झरे हैं॥

ताल मिलत ही गान लगत हैं

 ताल मिलत ही गान लगत हैं।

कष्ट - सुरीली तान लगत हैं॥

 

शीतल-मन्द-समीर चलत ही।

दर्द पतंग उड़ान लगत हैं॥

कष्ट तौ तुम हू सहौगे मान जाऔ

 कष्ट तौ तुम हू सहौगे मान जाऔ

हम बिना कैसें जियौगे मान जाऔ

 

वस्त्र फाटें तौ रफू करिवौ सरल है

मन रफू कैसें करौगे मान जाऔ

दुर्दसा कैसें कहें यै आपकी सौगात है

 दुर्दसा कैसें कहें यै आपकी सौगात है

जेठ कौ महिना है लेकिन है रही बरसात है

 

मन-हवन की आग अब आँखि’न तलक आम’न लगी

कृष्ण-पाखी द्वादशी में पूर्णिमा की रात है

नाम कों सिद्ध करती रही रात भर

 नाम कों सिद्ध करती रही रात भर

रातरानी महकती रही रात भर

 

एक हू बात मन की बताई नहीं

बस नख’न कों कुतरती रही रात भर

कहें कैसें लागै पियारी महौब्बत

कहें कैसें लागै पियारी महौब्बत

पजारौ करै है पजारी महौब्बत

 

तेरे संग लागत हुती फूल जैसी

तिहारे बिना है कटारी महौब्बत

विसर्जित व्यर्थ कौ अवसाद भारत नें ही करवायौ

 विसर्जित व्यर्थ कौ अवसाद भारत नें ही करवायौ

मधुरतम प्रेम कौ आस्वाद भारत नें ही करवायौ

 

कभू शबरी के माध्यम सों कभू कुब्जा के माध्यम सों

शिखर औ शून्य कौ सम्वाद भारत नें ही करवायौ

रोय, हँस-बोल कें इक रोज निमट जामें हैं

 रोय, हँस-बोल कें इक रोज निमट जामें हैं

दिन मुसीबत के हरिक हाल में कट जामें हैं

 

जीउ जब विनके जमाने सों उचट जामें हैं

नेह के मेह सनेहि’न सों लिपट जामें हैं

रसज्ञ-वृन्द कों रसिया अगर सुनाने होंय

 रसज्ञ-वृन्द कों रसिया अगर सुनाने होंय

तौ यै जरूरी है मन में तरल-तराने होंय

 

करील-वृक्ष पै काँटें उगेंरसाल नहीं

सुभाउ बदलौ जो रूठे सजन मनाने होंय

यों इ मारी नहीं गुलाटी है

 यों इ मारी नहीं गुलाटी है

ढील दै कें पतंग काटी है

 

काहु सीता पै फिर पर्यौ है दुख

यों ही थोरें जमीन फाटी है

युधिष्ठिर के जैसी न बतियाँ बनाऔ

 युधिष्ठिर के जैसी न बतियाँ बनाऔ

नरो कुंजरो के भरम कों मिटाऔ

 

सुनों वाहि, संजय, कथा मत सुनाऔ

वौ धृतराष्ट्र है वा कों अनुभव कराऔ

या लिएँ ही तौ जागी रही रात भर

 या लिएँ ही तौ जागी रही रात भर

वा की तकदीर सोई रही रात भर

 

आस पिय आगमन की लगी ही रही

एक डोरी सी इरझी रही रात भर

भलें हर ठौर पै अवसर मिले हमकों

 भलें हर ठौर पै अवसर मिले हमकों

तुम्हारी ठौर के माफिक लगे हमकों

 

वमन विष कौ न कर कें संयमन कीन्हौ

कटारे हू लगे सैंसूत से हमकों

भलें कहूँ हम ठहर न पाये

 भलें कहूँ हम ठहर न पाये

तुम्हारी देहरी सों टर न पाये

 

हमारे जैसे जखम हमारे

बढ़त रहे पर उभर न पाये

प्रीत जब आठौ पहर साठौ घरी बहवे लगी

 प्रीत जब आठौ पहर साठौ घरी बहवे लगी

नेह नद में वल्लरी सँग वल्लरी बहवे लगी

 

हीय में दौनों’न के रसधार सी बहवे लगी

नैन नैन सों लड़े रसमाधुरी बहवे लगी

परम अभिलास कान्हा हैं चरम अभिलास हैं राधे

 परम अभिलास कान्हा हैं चरम अभिलास हैं राधे

पियारौ है कन्हैया किन्तु खासमखास हैं राधे

 

निकुंज’न के प्रसून’न की सुगन्धित वास हैं राधे

जगत इक पर्व है और पर्व कौ उल्लास हैं राधे

चिडिय’न में ढेला मत मारौ

 चिडिय’न में ढेला मत मारौ

खेत’न बीच बिजूका गाड़ौ

 

यों तौ घुट कें मर जाऔगे

मन के द्वार, झरोका खोलौ

गुलाब’न की महक जैसी हमारी संस्कृति है

 गुलाब’न की महक जैसी हमारी संस्कृति है

शहद में कण्ठ तक डूबी हमारी संस्कृति है

 

चरै है घास और अमरित लुटावै है निरन्तर

गऊ जैसे गुण’न वारी हमारी संस्कृति है

गुलाब जैसें निखर सके तौ अढाई आखर उचर सके तौ

 गुलाब जैसें निखर सके तौ अढाई आखर उचर सके तौ

भुजा पसारें मिलैगी दुनिया सुगन्ध बन कें बिखर सके तौ

 

तुम्हें हु रूखी लगैगी दुनिया तुम्हें हु फीकी लगैगी दुनिया

कभू जो बाग’न में तितलिय’न की छुअन सों तुम हू सिहर सके तौ

कुंज गलिय’न में कलिय’न कों चुनते भये प्रेम पीयूष के मेह बरसन लगे

 कुंज गलिय’न में कलिय’न कों चुनते भये प्रेम पीयूष के मेह बरसन लगे

जा दिना सों कृपा आपकी है गयी दोउ हाथ’न सों आनन्द लूटन लगे

 

याद कीजै कभू तौ वौ स्वर्णिम घड़ी हेर कें टेर कें घेर कें छेर कें

आप हमकों जो माखन चखामन लगे स्याँप सौत’न की छतिय’न पै लोटन लगे

दोहा गजल - कारन झगरे कौ बनी, बस इत्ती सी बात

 कारन झगरे कौ बनी, बस इत्ती सी बात

हम नें तौ माँगी मदद, वा नें दइ खैरात

 

ऐसौ बरपायौ कहर, शशि नें मोहि निहार

हिय सागर कों दै गयौ, लहर’न की सौगात

सकुचाय नहीं मुसकाय करौ

 सकुचाय नहीं मुसकाय करौ

स्वागत पटुका पहराय करौ

 

ऐसें मत बात घुमाय करौ

है नेह तौ नेह निभाय करौ

उर-बसी होवै न होवै उर्वसी जैसी लगै है

 उर-बसी होवै न होवै उर्वसी जैसी लगै है ।

इस्क में तौ भूतनी हू जलपरी जैसी लगै है ।।

 

बीजुरी बाजै गगन में आग लागै तन-बदन में ।

ऐसे में तौ भैंसिया हू माधुरी जैसी लगै है ।। ।।

अनवरत उत्तुंग ध्वज फहरै हमारे हिन्द कौ

अनवरत उत्तुंग ध्वज फहरै हमारे हिन्द कौ

विश्व मस्तक पै तिलक सोहै हमारे हिन्द कौ

 

जैसें ध्रुव तारौ गगन में देर तक चमक्यौ करै

नाम त्यों ब्रह्माण्ड में चमकै हमारे हिन्द कौ