नयन क्यों आप के तर है रहे हैं।
ये अँसुआ तौ हमारे भाग के
हैं॥
बने हौ आप जब-जब भोर के पल।
हम'उ तब-तब सुमन जैसें झरे हैं॥
तनिक देखौ तौ अपनी देहरी
कों।
जहाँ हम आज हू बिखरे परे
हैं॥
हृदय-सरवर मधुर क्यों कर न होवै।
किनारे आप के रस में पगे
हैं॥
उलझ कें आप सों नयना हमारे।
सियाने सों दिवाने है गये
हैं॥
हृदय-प्रासाद में आए हौ जब सों।
"उजाले'न के झरोखा खुल रहे हैं"॥
अरे ऊधौ हमें उपदेश दै मत।
हमारे भाग में दुखड़ा लिखे
हैं॥
No comments:
Post a Comment