कमल, गुलाब, जुही, गुलमुहर बचात भये ।
महक रहे हैं महकते नगर बचात भये ॥
महक रहे हैं महकते नगर बचात भये ॥
भलें ही मौन रहत हैं विरक्त
जैसे किन्तु ।
नजर में सब कों रखत हैं नजर
बचात भये ॥
इन्हीं नें ढुँढ कें परचाय
कें बनाये हैं ।
नवीन पन्थ पुरानी डगर बचात
भये ॥
ये खण्डहर नहिं ये तौ धनी
हैं महल’न के ।
बिखर रहे हैं जो बच्च’न के
घर बचात भये ॥
समर – युद्ध, झगड़े;
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