रास, रस, अनुराग सों अनुरक्त अभिलाषा बहत है ।
जो अधूरी रह गयी नयन’न सों
वौ आशा बहत है ॥
जो तुम्हारे छल, कपट
और झूठ सों जनमी है वौ ही ।
अश्रुधारा बन दृग’न सों प्रेम की भाषा बहत है ॥
आप नें जो आन भाखी वौ हुती
झूठी कि साँची ।
बस यही शंका दृग’न सों बनि
कें जिज्ञासा बहत है ॥
आप की हर एक अति कों हमनें
यति बनि कें सह्यौ है ।
अब दृग’न सों रात दिन धीरज
की परिभाषा बहत है ॥
सूर नें जा कों सजायौ और
मीरा नें रचायौ ।
ब्रजगजल में हू वही कान्हा
की ब्रजभाषा बहत है ॥
आन – सौगन्ध,
प्रतिज्ञा; भाखी – बोली; यति – भिक्षुक;
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