मधुर तौ है मगर मीठी न समझौ ।
बड़ी बाँकी है यै सीधी न समझौ
॥
पियालौ एक और प्यासे हजार’न ।
सियानी बीर है, भोरी न समझौ ॥
पकड़ में आय जावै तब समझियो ।
बड़ी पक्की है यै कच्ची न
समझौ ॥
न गिन पाऔगे इतने यार या के
।
बस अपने रंग में डूबी न समझौ
॥
लड़ावै नैन हर प्यासे पथिक
सों ।
तृषा कों आप बस अपनी न समझौ
॥
सियानी बीर – चतुर नारी; तृषा – प्यास, लालसा;
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