यै छवी हम नें ही उकेरी है ।
रात जगमग दुपैर अँधेरी है ॥
चार दिन तौ कटें दुख’न के बिन ।
नित्य की सी प्रभात-फेरी है ॥
बोलनों नाँय, सिर्फ सुननों है ।
जो दशा सबकी वौ ही मेरी है ॥
नित कमावै है इक नयौ अनुभव ।
जिंदगानी गजब कमेरी है ॥
नींद तौ कब की है गई पूरी ।
जागिवे भर की मात्र देरी है
॥
प्रभातफेरी – सुबह सुबह
चक्कर लगाना; कमेरी – कमाने वाली;
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