भोरे-भारे बलम हमारे नित-नवीन
उतपात करत हैं ।
सावन में तौ आग लगामें, फागुन में बरसात करत हैं ।।
हम जो राष्ट्रपति होते तौ
पदम सिरी दै देते इनकों ।
हनीमून पै लै कें जामें हनुमान की बात करत हैं ।।
रस-बतिय’न की बात कही तौ छकड़ा भर गन्ना लै आये ।
रात-रात भर गन्ना चूसें, बात’न में परभात करत हैं
।।
हमनें का कछु नहीं सिखायौ
कछु हमारे काम न आयौ ।
हम सों जो आयात करें सब सौतन
कों निर्यात करत हैं ।।
काहे कों रिसियामें इन सों
काहे कों बिदरामें इनकों ।
ब्रज की गोपी जानत हैं कि
अपने ही तौ घात करत हैं ।।
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