कोऊ इतनों अच्छौ कैसें होय सकत है ।
दसमुखवारौ भोरौ कैसें होय
सकत है ॥
दूजे रस में मिलि कें बदलै
तब तौ सम्भव ।
बिनु मीठे के मीठौ कैसें होय सकत है ॥
सन्त’न कौ सम्मान, परन्तु
बिना गृहस्थी ।
दुनिया तेरौ परचौ कैसें होय
सकत है ॥
जो मजदूर करम कों ही निज धरम
बनावै ।
वौ कर्म’न
कौ हेठौ कैसें होय सकत है ॥
हम धरती के बाजे आप गगन के
राजे ।
अपनों रिश्तौ पक्कौ कैसें
होय सकत है ॥
आज तलक हम कपटी-कान्हा
कों नहिं भूले ।
हमरौ हिय पत्थर कौ कैसें होय
सकत है ॥
बरसाने वारी नें पुछवायौ है
कान्हा ।
प्रणय-अधूरौ, पूरौ
कैसें होय सकत है ॥
परचौ – परिचय;
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