जन्म सों मृत्य तक झमेले हैं ।
कृष्ण नें कम कलेश झेले हैं
॥
एक होवै स्वरूप तौ बरनें ।
कृष्ण तौ नित-नये-नवेले हैं ॥
नेंकु सी घाम हम न सह पामें
।
कृष्ण दावानल’न सों खेले हैं
॥
मधुपुरी में जो बच गये पापड़
।
जाय कें सिन्धु-मध्य बेले हैं ॥
मित्र के पग पखारै अँसुअ’न
सों ।
ऐसे तौ कृष्ण ही अकेले हैं ॥
कर्म सों कृष्ण प्रीत के
अवतार ।
युद्ध में भाग्य नें ढकेले
हैं ॥
घाम – धूप, दावानल – जंगल की आग;
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