हठिय’न
के हठयोग अलग्ग’इ होमें हैं ।
सीधे-सच्चे लोग अलग्ग’इ
होमें हैं ॥
तन कों भूख्यौ राखें मन कों
तृप्त करें ।
हरि-भक्त’न के भोग अलग्ग’इ होमें हैं ॥
हरि-भक्त’न के भोग अलग्ग’इ होमें हैं ॥
पीर खरीदें, बेचें प्रेम, कमावें चैन ।
रसिक’न के उद्योग अलग्ग’इ होमें हैं ॥
नित्य-नित्य नहिं जनमत हैं मीरा-शबरी ।
जोगनिय’न के जोग अलग्ग’इ होमें हैं ॥
पीर पराई, पर, उपचार करें अपनों ।
सन्त-जन’न के रोग अलग्ग’इ होमें हैं ॥
रसिक’न के उद्योग अलग्ग’इ होमें हैं ॥
नित्य-नित्य नहिं जनमत हैं मीरा-शबरी ।
जोगनिय’न के जोग अलग्ग’इ होमें हैं ॥
पीर पराई, पर, उपचार करें अपनों ।
सन्त-जन’न के रोग अलग्ग’इ होमें हैं ॥
No comments:
Post a Comment