स्वयं विषाद के अनुभव जिन्हें कमाने होंय ।
सिखामें का उन्हें धक्का ही
जिन कों खाने होंय॥
भरत की भूमि कों भारत कहन
लगे हम लोग ।
अब आस दूजी यही है कि हम सियाने होंय ॥
अब आस दूजी यही है कि हम सियाने होंय ॥
कहूँ तौ आत्म-समाधान के ठिकाने होंय ॥
भलें ही बात बनन में लगे जमाने होंय ॥
No comments:
Post a Comment