किनारे क्यों बनें हमलोग ।
निरन्तर क्यों कटें हमलोग ॥
बिरज कौ अर्थ सेतु है ।
उतारें पलटनें हमलोग ॥
भरे हैं तीर तरकश में ।
समर सों क्यों हटें हमलोग ॥
समय कम्प्यूटर’न कौ है ।
पहाड़े क्यों रटें हमलोग ॥
हवन कीन्हे, हवन करिहें ।
वचन सों क्यों नटें हमलोग ॥
अकेले परि गये तौ का ।
चलौ मिलि कें खटें हमलोग ॥
नहीं जब साँच कों कछ आँच ।
कहानी क्यों गढ़ें हमलोग ॥
सेतु – पुल;
समर – युद्ध; हवन – श्रम, युक्ति और सदिच्छा के साथ किया गया लोक-कल्याणकारी कार्य;
नटना – वचन से मुकरना; खटना – मिल कर किसी कार्य सिद्धि के लिये जी जान से जुट जाना;
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