या लिएँ ही तौ जागी रही रात भर
वा की तकदीर सोई रही रात भर
आस पिय आगमन की लगी ही रही
एक डोरी सी इरझी रही रात भर
पीउ आते तौ चढ़ती अटारी पै हू
देहरी पै ही ठाड़ी रही रात भर
दिन में तौ वानें डट कें
दिखाई ठसक
किन्तु मन में कसक सी रही
रात भर
साँझ दिन में ढली मन पै आरी
चली
भीर पीर’न की भारी रही रात
भर
भोर होते ही फिर यन्त्र सी
बन गयी
टूटती देह जा की रही रात भर
गिरह कौ शेर:
रात भर एक बदरा भटकतौ रह्यौ
“ एक बदरी
बरसती रही रात भर “
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