कबतक करिहौ आनाकानी ।
अब तौ स्वीकारौ मेहमानी ॥
सुमन सुगन्ध’न
कों तरसत हैं ।
का अजहूँ करिहौ मनमानी ॥
तुम का जानों विरहिन रतियाँ
।
जा नें काटीं वा नें जानी ।
जानत हौ पहिचानत नाहीं ।
कैसी है यै छेड़ाखानी ॥
कबहू हमरे घर’हु
पधारौ ।
तुमहिं चखानी है गुड़-धानी
॥
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