ब्रज के सिवाय होयगी अपनी बसर कहाँ।
ब्रज-भूमि कों बिसार कें जामें
किधर? कहाँ?
कनुआ सों दिल लगाय कें हम
धन्य है गये।
अन्यान्य की पिरीत में ऐसौ असर कहाँ॥
सूधे-सनेह की जो डगर ब्रज में है
हजूर।
दुनिया-जहान में कहूँ ऐसी डगर कहाँ॥
तन के लिएँ तौ ठौर घनी हैं सबन्ह
के पास।
बबुआ मगर बसाउगे मन के नगर
कहाँ॥
उपदेस ज्ञान-ध्यान रखौ आप ही 'नवीन'।
जिन के खजाने लुट गये विन
कों सबर कहाँ॥
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