लौट कें ब्रज में काहें आऔगे ।
आप तौ द्वारिका बसाऔगे ॥
और तौ कौन पै चलैगौ जोर ।
नन्द-जसुधा ही कों रुलाऔगे ॥
लूटि नवनीत हम गरीब’न कौ ।
आप तौ धूर में मिलाऔगे ॥
राधिका कों बिसारि कें मोहन
।
आप तौ रुक्मिणी कों लाऔगे ॥
खाल तरुअ’न की छिल गई कान्हा
।
और कब तक हमें नचाऔगे ॥
दुक्ख माँगे, परोस
डारे दुख । *
का सुख’न कों नहीं चखाऔगे ॥
है जरूरत हमें तुम्हारी आज ।
का कुरुक्षेत्र में ही आऔगे
॥ **
नवनीत – माखन;
* कुंती द्वारा कृष्ण से
पीड़ाओं की याचना का सन्दर्भ
** सूर्यग्रहण के दौरान
कुरुक्षेत्र में ब्रजवासियों से मिलन का सन्दर्भ
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