परम अभिलास कान्हा हैं चरम अभिलास हैं राधे
पियारौ है कन्हैया किन्तु
खासमखास हैं राधे
निकुंज’न के प्रसून’न की
सुगन्धित वास हैं राधे
जगत इक पर्व है और पर्व कौ उल्लास हैं राधे
अधर पै नाम आते ही हिये में
रस घुरन लागै
उमंग’न की तरंग’न कौ चिरन्तन
रास हैं राधे
कन्हैया जू जसोमति कों जो
तुमनें मुख में दरसायौ
तुम्हारे वा अखिल ब्रह्माण्ड
कौ विन्यास हैं राधे
शरद की रात्रि में रसिया के
सँग छह मास तक नाचीं
कोऊ मानें न मानें पर बड़ी
बिन्दास हैं राधे
ललित लीला हु दरसाईं उचित
मरजाद हू राखी
न जा कौ आदि ना ही अन्त वौ
आकास हैं राधे
कभू काहू की झोरी खाली राखी
होय तौ बोलौ
अनुग्रह और करुणा कौ अगम
इतिहास हैं राधे
कहूँ दौलत के डेरे हैं कहूँ
सुहरत के फेरे हैं
मगर सब सों धनी हम हैं हमारे
पास हैं राधे
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