ध्यान सों देखौ तौ लगभग हर महीना बह रहे हैं ।
ताप के मारें हिमालय के
पसीना बह रहे हैं ॥
मार डारे भीड़ नें मनजीत और
मरियम कहूँ पै ।
तौ कहूँ दरिया’न में सूरज-सकीना बह रहे हैं ॥
वा रे ऊपर वारे तेरी खसबु’अन
के रूप धर कें ।
काशी-मथुरा तौ कहूँ मक्का-मदीना बह रहे हैं ॥
व्योम की आकाशगंगा में
अनादिकाल सों ही ।
कैसे-कैसे कीमती दुर्लभ नगीना बह रहे हैं ॥
नित-नवीन आनन्द और उत्साह की भागीरथी सम ।
गुरु-कृपा सों इल्म-नद सीना-ब-सीना बह रहे हैं ॥
व्योम – आकाश;
इल्म नद – ज्ञान की गंगा, गुरुशिष्य परम्परा में ज्ञान के पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते रहने का भाव;
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