वृहद, विशाल जड़’न सों कट गई ।
विस्तृत-सीमा कितनी घट गई ॥
सुख में तौ सब संग रहत हे ।
भीर परी तौ काई छट गई ॥
सेला तौ ओढ़े माटी नें ।
वृक्ष’न की तकदीर उलट गई ॥
भलमनसाहत श्वास गिनत है ।
कबिरा तेरी चादर फट गई ॥
पुष्ट हुती पूरब की काया ।
पश्चिम की संगत में लट गई ॥
कौन-कौन के मन कों राखें ।
अकल मनी तौ सकल बिनट गई ॥
टिकट कराय दई कान्हा नें ।
भीड़भाड़ वारी खटपट गई ॥
भीर परी तौ–जब
कष्टों से घिर गये तब;
काई छंटना – अचानक ही सब का तितर-बितर हो जाना,
छोड़ कर चले जाना; सेला तौ...... – धूल धूसरित धरती पर डामर और सीमेण्ट के महामार्गों का
निर्माण; लट गई – पतली हो गयी, कमजोर हो गयी;
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