जब दुनिया के व्याप समझ में आन लगत हैं ।
सब रहस्य चुपचाप समझ में आन
लगत हैं ॥
काग’न के कुल में जब कुहू-कुहू होवत है ।
सिगरे क्रिया-कलाप समझ में आन लगत हैं ॥
टहनी सों पत्ता की भाँति
बिछड़ कें देखौ ।
सिगरे पुण्य और पाप समझ में
आन लगत हैं ॥
नर सों नारायण बस वौ ही बन
पावत है ।
जा कों पश्चात्ताप समझ में
आन लगत हैं ॥
स्वयं समय जब तबला-वादक बन जावत है ।
सिगरे स्वर-आलाप समझ में आन लगत हैं ॥
छत्र पिता कौ जब सिर सों उठ
जावत है न ।
सिगरे सुख-सन्ताप समझ में आन लगत हैं ॥
काग – कौआ;
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