अपनी खुसी सों थोरें ई सब नें करी सही ।
बौहरे नें दाब-दूब कें करबा लई सही ॥
यै सोच कें ई सबनें उमर भर दई सही ।
समझे कि अब की बार की है आखरी सही ॥
पहली सही नें लूट लयो सिगरौ चैन-चान ।
अब और का हरैगी मरी दूसरी सही ॥
मन कह रह्यौ है बौहरे की बहिय’न कों फार देंउ ।
फिर देखों काँ सों लाइहै पुरखा’न की सही ॥
धौंताए सों नहर पै खड़ो है मुनीम साब ।
रुक्का पे लेयगौ मेरी सायद नई सही ॥
म्हाँ- म्हाँ जमीन आग उगल रइ है आज तक ।
घर-घर परी ही बन कें जहाँ बीजरी सही ॥
तो कों भी जो ‘नवीन’ पसंद आवै मेरी बात ।
तौ कर गजल पे अपने सगे-गाम की सही ॥
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