गुलाब जैसें निखर सके तौ अढाई आखर उचर सके तौ
भुजा पसारें मिलैगी दुनिया सुगन्ध
बन कें बिखर सके तौ
तुम्हें हु रूखी लगैगी
दुनिया तुम्हें हु फीकी लगैगी दुनिया
कभू जो बाग’न में तितलिय’न की छुअन सों तुम हू सिहर सके तौ
तुम्हारे कहवे सों कछ दिन’न
कों चलौ कि धर लंगे धीर लेकिन
दवा बदलवे सों हू ये गहरे जखम
हमारे न भर सके तौ
अभी तौ हमकों बनाय बाती उजास
लूट और लुटाय रए हौ
तनिक तौ सोचौ कहा करौगे भविष्य
में हम न बर सके तौ
जो मिल गयौ है नसीब समझें सबन्ह
कों सब कछ कहाँ मिलै है
यै हू गनीमत ही है कि साजन गली
सों हमरी गुजर सके तौ
गिरह कौ शेर :
अभी तलक तौ सनेह-नद के तट’न की गाथा ही सुन
रखी है
“ समुद्दर’न की हु थाह लिंगे
परन्तु घर सों निकर सके तौ “
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