परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी

परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी

                  संक्षिप्त परिचय – नवीन सी. चतुर्वेदी ( ब्रजगजल प्रवर्तक, बहुभाषी शायर (कवि) एवं व्यंग्यकार)

कहाँ गागर में सागर होतु ऐ भैया

 कहाँ गागर में सागर होतु ऐ भैया।

समुद्दर तौ समुद्दर होतु ऐ भैया॥

 

हरिक तकलीफ कौं अँसुआ कहाँ मिल'तें।

दुख'न हू कौ मुकद्दर होतु ऐ भैया॥

 

छिमा तौ माँग और सँग में भलौ हू कर।

हिसाब ऐसें बरब्बर होतु ऐ भैया॥

 

सबेरें उठ कें बासे म्हों न खाऔ कर।

अतिथिय’न कौ अनादर होतु ऐ भैया॥

 

कब'उ खुद्द'उ तौ गीता-सार समझौ कर।

जिसम सब कौ हि नस्वर होतु ऐ भैया॥

 

जबै हाथ'न में मेरे होतु ऐ पतबार।

तब'इ पाँय'न में लंगर होतु ऐ भैया॥

 

बिना आकार कछ होबत नहीं साकार।

सबद कौ मूल - आखर होतु ऐ भैया॥

 

 

(हिन्दुस्तानी ज़बान में भावार्थ ग़ज़ल)

कहाँ गागर में सागर होता है साहब

समन्दर तौ समन्दर होता है साहब

 

हरिक तकलीफ़ को आँसू नहीं मिलते

ग़मों का भी मुक़द्दर होता है साहब

 

मुआफ़ी के सिवा नेकी भी कीजेगा

हिसाब ऐसे बराबर होता है साहब

 

सवेरे उठ के बासे मुँह न खाएँ हुजूर

ये महमाँ का अनादर होता है साहब

 

कभी ख़ुद भी तो गीता-सार समझें आप

बदन सब ही का नश्वर होता है साहब

 

हमारे हाथों में जब होती है पतवार

तभी पाँवों में लड़्गर होता है साहब

 

बिना आकार कछ होता नहीं साकार

सबद का मूल - अक्षर होता है साहब

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