जनम अष्टमी के अवसर पै कान्हा रस बरसाय रहे हैं॥
पान करन कों भक्तन के टोला
के टोला आय रहे हैं॥
माखन मिसरी के प्रेमी नें भूतल
पै अवतार लियौ है ।
संतन के मन मुदित ह्वै रहे दुष्टन के घबराय रहे हैं॥
आज तौ हमकों सिगरी दुनिया, नन्दभवन जैसी लागत है ।
हिलमिल कें सब नाच रहे और पाग-पँजीरी खाय रहे हैं ॥
धन्य-धन्य हे ब्रज की भूमि, हम तेरे गुणगान करें का ।
बड़े-बड़े संत और तपस्वी तेरी
महिमा गाय रहे हैं॥
अपने असली नैन मूँद कें, देख सकौ तौ देखौ पल भर
।
परमपूज्य गुरुदेव हमारे, हमें देख मुसकाय रहे हैं ॥
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