कोऊ समझै तौ या में हू रस,
रीत है ।
केश विन्यास हू एक संगीत है
॥
या की सरगम अजब या के आखर
गजब ।
नैन-अंजन मधुरता भरौ गीत है ॥
हार जामें रसिक इन कों खोलत
भये ।
कर्ण-फूलन के प्रारब्ध में
जीत है ॥
हीय जैसौ चतुर कोऊ देख्यौ
नहीं ।
पीउ कों रख कें प्यासौ, सुधा पीत है ॥
भाव में भर कें देखें अगर दो
घड़ी ।
करधनी के सिकंजा में नवनीत
है ॥
केश विन्यास – बाल सँवारने
की कला; नैन अंजन – आँखों का काजल; प्रारब्ध – भाग्य; हीय
– हृदय, पीउ – प्रिय; सुधा – अमृत; करधनी – कमर का एक आभूषण; नवनीत – माखन,
सारतत्व;
No comments:
Post a Comment