भलें कहूँ हम ठहर न पाये
तुम्हारी देहरी सों टर न
पाये
हमारे जैसे जखम हमारे
बढ़त रहे पर उभर न पाये
तुमें हुती प्रीत पतझर’न सों
हमारी किस्मत, उजर न पाये
समे पै साँची कही गयी नैं
मुकरनों हो तब मुकर न पाये
ये कैसे सागर वे कैसे बदरा
हमारी अँजुरी हू भर न पाये
बड़े-बड़े’न कौ घमण्ड तोर्यौ
स्व-दम्भ के पर कतर न पाये
लड़ाई मूँछ’न की अति बुरी है
हम’उ समर में समर न पाये
गिरह कौ शेर:
नदी’न में ही दिखाए करतब
“ समुद्दर’न में उतर न पाये
“
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