दुर्दसा कैसें कहें यै आपकी सौगात है
जेठ कौ महिना है लेकिन है
रही बरसात है
मन-हवन की आग अब आँखि’न तलक आम’न लगी
कृष्ण-पाखी द्वादशी में पूर्णिमा की रात है
नैन सूखे बैन रूखे मन पियासौ
रह गयौ
तौ हु कछ कहते भये मन आज हू
सकुचात है
जिच्च जैसें ही कियौ हो हिय
हमारौ आप नें
हम समझि गे अब हमारे भाग में
सह-मात
है
डार गलबहियाँ सजन सौतन सों
जो बतियात हौ
हँस कें हम सह तौ रहे हैं पर
यै वज्राघात है
हम क्षमा करते नहीं तौ और का
करते कहौ
कर न पावै माफ जो वौ ‘ साफ
ही ह्वै ‘ जात है
प्रेम कौ झरना झरौ तब ज्ञान
की गंगा बही
मन मलिन सत्संग कर कें ‘ साफ
ह्वै ही ‘ जात है
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