गुलाब’न की महक जैसी हमारी संस्कृति है
शहद में कण्ठ तक डूबी हमारी
संस्कृति है
चरै है घास और अमरित लुटावै
है निरन्तर
गऊ जैसे गुण’न वारी हमारी संस्कृति है
कहूँ कुहुकें कोयलिया तौ
कहूँ पै मोर नाचें
उमंग’न सों भरी पूरी हमारी
संस्कृति है
बड़ी मनमोहिनी है मदभरी मीठी
रसीली
किशन की बाँसुरी जैसी हमारी
संस्कृति है
यहाँ के रहिवे वारे नित नवीन
उत्सव मनावें
बहार’न की फुहार’न सी हमारी
संस्कृति है
No comments:
Post a Comment