नेह के मेह ढोए हमनें हू ।
नैन अपने भिगोए हमनें हू ॥
हाथ लग पाए जो न राधा के ।
वे खजाने तौ खोए हमनें हू ॥
जब तेरी प्रीत के पुरान बँचे
।
हाथ गंगा में धोए हमनें हू ॥
कैसें कह देंय आस नाँय रखी ।
खेत में बीज बोए हमनें हू ॥
नाम तुम जा पै जप रहे पिय कौ
।
वा में दाने पिरोए हमनें हू
॥
पारखी लोग ही परख पाए ।
पोर घी में डुबोए हमनें हू ॥
नेह – स्नेह,
प्रेम; मेह – बादल;
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