झूठे-साँचे सब उरहाने, मन के भीतर रख लीने हैं ।
प्रीतम की पाती पढ़ि कें छाती
पै पत्थर रख लीने हैं ॥
सावन की सौगन्ध है तुमकों याद
कबू करियो नहिं हमकों ।
हमनें हू पलक’न के पाछें मीठे-बादर रख लीने हैं ॥
सिगरी झूठी-साँची पतियाँ, सजन तुम्हारी सब रसबतियाँ ।
मन सों काढ़ि दई हैं केवल ढाई-आखर रख लीने हैं ॥
नहिं मिलनों ता कौ मातम का, मिलिगौ वा जैसौ उत्तम का ।
चन्द्र-सरोवर नाँहि मिले तौ प्रेम-सरोवर रख लीने हैं ॥
नैन हमारी पीर लखें नहिं, कान हमारी बात सुनें नहिं ।
प्रीतम-प्यारे तुमनें हू ये कैसे चाकर रख लीने हैं ॥
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