भलें हर ठौर पै अवसर मिले हमकों
तुम्हारी ठौर के माफिक लगे
हमकों
वमन विष कौ न कर कें संयमन
कीन्हौ
कटारे हू लगे सैंसूत से हमकों
विरोध’न कों समर्थन मान
अपनायौ
मिले तब जुग पराग’न में पगे
हमकों
भलें ही तीन बिन्दी के हुते
पासे
हुनर सीख्यौ तौ पौ बारह परे
हमकों
जगत कों मात्र मृगतृष्णा
नहीं दीन्ही
मरुस्थल नें तपस्थल हू दिये
हमकों
हमारे संग ही रहनों हुतो तौ
तुम
कभू तौ रोकते या टोकते हमकों
गिरह कौ शेर:
तुम्हारी नाँय में हाँ के
दरस कीन्हे
“ नयन मूँदे तभी दरसन भये
हमकों “
ठौर – जगह, स्थान, ठिकाना; कटारा – इमली का खट्टा फल; सैंसूत – शहतूत, एक मीठा और रसीला ;
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