नहीं ऐसौ नहीं अन्धेर है बस ।
कुहासे कौ तनिक सौ ढेर है बस
॥
कली कों ज्ञात है प्रारब्ध
अपनों ।
सवेरौ हैवे भर की देर है बस ॥
कबू सोचें तौ ऐसौ हू लगत है
।
धरा काऊ परी कौ घेर है बस ॥
उमड़ते और उड़ते अश्रु’अन में
।
अधिकतम चार दिन कौ फेर है बस
॥
तनिक बाजे बजे तौ सिर
पकल्ल’ओ ।
हमारौ जीउ घर कौ शेर है बस ॥
प्रारब्ध – भाग्य;
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