हमारे पूर्व हू दौनों’न कों तोल्यौ गयौ है ।
शकर सों लाख बेहतर नीम कों
बोल्यौ गयौ है ॥
अजी घी-दूध का हैं अब तौ पानी हू मलिन है ।
निरन्तर अमरित’न में ही जहर घोल्यौ गयौ है ॥
हमारी अस्थिय’न कों तुम
नदि’न में मत बहइयो ।
हमें संज्ञान है इनमें कहा
रोल्यौ गयौ है ॥
नियति कों योजना कर कें
बिगार्यौ है बिरादर ।
पहन कें बूट कच्ची छत्त पै
डोल्यौ गयौ है ॥
न तौ जीते’न में हैं हम न ही
हारे’न में हैं ।
अभी पत्ता तुरुप वारौ कहाँ
खोल्यौ गयौ है ॥
शकर – शक्कर,
चीनी; मलिन – अशुद्ध; रोलना – डालना, मिलाना, घोलना आदि; नियति – प्रकृति,
कुदरत; बूट – जूता, जूते;
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