क्यों वृथा ही वसन उतारत हौ ।
बन रही बात क्यों बिगारत हौ
॥
बात तौ चल रही है कोयल की ।
कान के पर्दा काहें फारत हौ
॥
बेल, बूँटे’न में हू अवसर हैं ।
मूल जड़ कों ही क्यों उखारत
हौ ॥
एक-दो होंय तौ पढ़ें हम हू ।
रोज दस पोस्ट पेल डारत हौ ॥
हम अगर दान कर रहे हैं दान ।
गाँठ सों आप का निकारत हौ ॥
वसन – कपड़े; उचारत हौ – बोलते हो, कर रहे हो;
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