नैन झुकिवे के बाद उठते भये ।
दो सितारे गगन में उगते भये॥
फूल शाखा’न सों उतरते भये ।
तो सों मिलिहें स्वयं लुढ़कते भये॥
केश लहराये छत्त पै जा खन ।
थम गए मेघ हू बरसते भये॥
एक पल में ‘हाँ’ एक
पल में ‘ना’ ।
झर रहे हैं गुलाब खिलते भये॥
अप्सरा तू धरा की है तो कों
।
अंक भरिहें गगन झिझकते भये॥
जा खन – जिस पल;
धरा – पृथ्वी; अंक भरना – आलिंगन करना, आगोश में समाना;
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