खुस्क-अँखिया’न में जो पानी है ।
यै ही नटराज की निशानी है ॥
दक्ष जैसे’न संग रहनों है ।
और कथा राम की सुनानी है ॥
आदि में आस अन्त में सन्तोष
।
मध्य विषपान की कहानी है ॥
हमनें कल हू बितायौ हँस-हँस कें ।
आज हू हँस कें मात खानी है ॥
प्रीत की रीत हम न छोडिंगे ।
यै बिमारी तौ खानदानी है ॥
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